अपील -

राजीव भाई ने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के नाम समर्पित कर दिया था । अनेकों स्थानो पर उनके व्याख्यान हुए तथा अनेकों लोगो को उनका सानिध्य प्राप्त हुआ । आप मे से जिनके पास कोई उल्लेखनीय सामग्री (फोटो, सीडी, वीडियो, बुक्स आदि) हो तो उसे मेरे ईमेल( rakeshswabhiman@gmail.com ) पर या कार्यालय पर भेजे जिससे उस सामग्री को सभी के लिए उपलब्ध कराया जा सके – राकेश कुमार जी (केंद्रीय प्रभारी )

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समझौतावादी नही थे राजीव भाई

- डाँ. जयदीप आर्य, मुख्य केंद्रीय प्रभारी भारत स्वाभिमान

भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत की सम्पूर्ण आजादी के आंदोलन में आहुति देने वाले भारत स्वाभिमान के राष्ट्रीय सचिव, स्वदेशी आंदोलन के प्रणेता, प्रखर राष्ट्रीय चितंक भाई राजीव दीक्षित जी के निधन के बाद समय मानो रुक सा गया। सम्पू्र्ण राष्ट्र में, विश्व के विभिन्न देशों में शोक की लहर दौड गई। परमात्मा के उस प्रतिभाशाली पुत्र को खोने के बाद मां ही नहीं भारत मां भी आँसू न रोक पाई होगी। लोग कहा करते है कि पूर्व सांसद स्व, प्रकाशवीर शास्त्री के बाद किसी व्यक्तित्व का वक्तव्य सुनकर समय ठहर जाता था तो उस व्यक्ति का नाम था “राजीव भाई”। “तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहे न रहे ।” उन्होंने अपने जीवन, जवानी व अपनी प्रतिभा को मातृभूमि की बलिवेदी पर आहूत कर दिया। महात्मा गांधी आश्रम वर्धा (महाराष्ट्र), इलाहाबाद, हरिद्वार आदि उनकी कर्मभूमि के मुख्य केन्द्र थे। यद्यपि उनका जन्म स्थान अलीगढ उत्तर प्रदेश हुआ। मां मिथलेश, पिता श्री राधेश्याम दीक्षित के दो पुत्र श्री राजीव एवं श्री प्रदीप जी तथा एक पुत्री बहन लता और उन सब में भी राजीव भाई सबसे बडे थे। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से B-Tech करते समय से ही आपके भीतर राष्ट्र के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना पैदा हुई। भारतीय सभ्यता, भारतीय संस्कृति पर मंडरा रहे खतरों को लेकर आक्रोश पैदा हुआ। मां भारती को मानसिक गुलामी, विदेशी भाषा-विदेशी षड्यन्त्रों के मकडजाल से मुक्त करवाने के लिए अपने “आजादी बचाओ आन्दोलन” को स्वर प्रदान किया। आपने राष्ट्र को आर्थिक महाशक्ति के रुप में खडा करने के लिए आजीवन ब्रह्मचारी रहने का निर्णय लिया और उसे जीवन पर्यन्त निभाया। खादी कपडों के संत अथवा स्वदेशी कपडों के किसी संत को, किसी दिव्यात्मा को महात्मा गांधी के बाद कभी याद किया जायेगा तो भाई राजीव जी का नाम सबसे ऊपर आयेगा। स्वदेशी का आग्रह सारी जिन्दगी उन्होंने नहीं छोडा। पं, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद की तरह स्वदेशी विचारधारा को उन्नत किया, उसे प्रसारित किया, उसे स्थापित करने के मार्ग में अपने जीवन की आहुति इस राष्ट्र-यज्ञ में सौंप दी। विदेशी कम्पनियों की लूट की बात हो या भारत का स्वर्णिम अतीत का गौरव जगाने की बात हो, भाई राजीव की वाणी ने भारत के युवाओं में देश-विदेशों के राष्ट्रभक्त भाई-बहनों में स्वाभिमान को जागृत किया। राजीव भाई अक्सर कहा करते थे कि हम विज्ञान में सबसे आगे, धन-सम्पदा में सबसे आगे थे। परन्तु हमने जीवन में चालाकी नही सीखी। इसी कारण अंग्रेजों के गुलाम बने रहे। घरेलू नुक्खों की बात हो या होम्योपैथी चिकित्सा की बात हो उनकी इस पर विशेष पकड थी। इसके माध्यम से उन्होंने हजारों लोगों का ईलाज किया। इस विषय पर उनका गहन अध्ययन, लेखन एवं अनुभव था। वे पाश्चात्य संस्कृति, पाश्चात्य भाषा के साथ-साथ पाश्चात्य चिकित्सा के भी घोर विरोधी थे। अन्त तक उन्होंने इस सिद्घान्तों का दृढता के साथ पालन किया। सिद्घान्तों का पालन करते हुए अनेकों बाध आयें, तूफान एवं झंझावत उठे जिन्होंने उनके जीवन को भी लीलने का प्रयास किया। परन्तु उन्होंने कभी समझौतावादी एवं पलायनवादी होना स्वीकार नही किया। सिद्घान्तों के प्रति दृढता सीखनी हो तो उनका जीवन हम सब के लिये आदर्श रहेगा। भारत मां के गौरव पुत्र, ओजस्वी वक्ता-जिनकी वाणी पर मां सरस्वती का वास था। जब वह बोलते थे तो घण्टों “मन्त्र-मुग्ध” होकर लोग उनको सुनते रहा करते थे। भारत के स्वर्णिम अतित का गुण-गान करते हुए अथवा विदेशियों के द्वारा की गई आर्थिक लूट के आँकडे गिनवाते हुए उनका दिमाग कम्प्यूटर से भी तेज चलता था। यदि उन्हें भारत का चलता-फिरता सुपर कम्प्यूटर कहा जाये तो अतिश्योक्ति नही होगी। विलक्षण प्रतिभा के धनी भाई राजीव जी की विनम्रता सबके ह्रदय को छू जाती थी। योगॠषि पूज्य स्वामी जी के सद्रशिष्य, अहंकारमुक्त, संस्कारयुक्त राजीव भाई एक सात्विक कार्यकर्त्ता थे। भारत को विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनाने को संकल्पित ‘भारत-स्वाभिमान’ के उद्देश्यों को प्रचारित-प्रसारित करते हुए आप छत्तीसगढ राज्य के दुर्ग जिला में प्रवास पर थे। आपने अपने कर्मक्षेत्र में प्राणों का उत्सर्ग कर भारत मां को आर्थिक गुलामी से मुक्त करवाने हेतु अपना बलिदान कर दिया। छत्तीसगढ से कार्यकर्त्ताओं ने उनकी सेवा में आदर्श पूर्ण कर्त्तव्य का निर्वाह किया। परन्तु अफसोस काल के क्रूर पंजो से हम उन्हें नहीं बचा पाये । उनके आकस्मिक निधन पर पतंजलि योग समिति, भारत स्वाभिमान, महिला पतंजलि योग समिति के सभी केन्द्रीय प्रभारी, प्रन्तीय प्रभारी, जिला प्रभारी, तहसील प्रभारी सभी शिक्षकों व कार्यकर्त्तों की ओर से भावपूर्ण श्रद्घाजंलि। हम सब कार्यकर्त्ता संकल्प लेते है कि हम स्वदेशी के प्रति 100 प्रतिशत आग्रह रखते हुए अहंकारमुक्त, विनम्र जीवन को अपनाकर भाई राजीव जी के सपनों को पूरा करने का प्रयास करेंगे। वो मरे नहीं आस्था चैनल एवं संस्कार चैनल के माध्यम से उनकी वाणी, उनका संदेश उनको सदैव अमर बनाये रखेगा। वे सदैव हमारे बीच रहेगें।


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राजीव भाई ने जन-जन में ‘स्वदेशी’ का स्वाभिमान जगाया

राकेश कुमार (केंद्रीय प्रभारी

“भाई राजीव जी” एक ऐसा व्यक्ति जो सदैव देश के बारे में चिन्तन करता था, एक ऐसी आत्मा जो वह कहती, उसको जीती थी, एक ऐसा व्यक्ति जो देखने में तो बहुत सामान्य सा लगता था लेकिन ज्ञान के भण्डार में बहुत ही विस्तृत, विराट व विशेष था। राजीव भाई जो मात्र दो जोडी कपडों के साथ पूरे भारत में घूमते थे, जो किसी घर या स्थान पर कम ट्रेन में ज्यादा रहते थे। एक ऐसे व्यक्ति जो कठिन से कठिन विषय को सरलतम भाषा में समझते थे और उनके उस कथन को देश के 118 करोड लोग आसानी से अपने भीतर उतार लेते थे। उनकी बात को देश के बुद्घिजीवी से लेकर सामान्य वर्ग तक सभी समझते थे, उनकी बात का असर मजदूर, कृषक, बच्चे, से लेकर वैज्ञानिक, प्रोफेसर व डाँक्टर तक एक समान होता था। जिनको ज्ञान का भण्डार, चलती-फिरती लाईब्रेरी या चलता फिरता इन्साइक्लोपिडिया कहा जाता था। जिनके लिये कोई भी विषय अछूता नही था। जिनको अर्थशास्त्र से लेकर भूगोल तक एवं इतिहास से लेकर वर्तमान तक की सारी जानकारी थी, जो एक बार इतिहास जैसे नीरस विषय पर बोलते थे तो लोग टकटकी लगाकर उनकी ओर देखते थे कि अब अगला शब्द उनके मुंह से कौन सा निकलेगा। जिनके हर विषय के व्याख्यान पर हजारों की भीड जहां की तहां ठहर सा जाती थी, ऐसा लगता था कि उनके व्याख्यान को सुनते-सुनते समय ठहर सा जाता है तथा 4-5 और कभी-कभी तो 6-8 घण्टों तक लोग खाना-पीना, लघुशंका भूलकर एकटकी लगाकर उनको लगातार सुनते रहते थे। ऐसे व्यक्तित्व जिन्होंने स्वयं परिश्रम करके तथा प्रो0 धर्मपाल के परिश्रम को जन-जन तक पहुंचाया, जिन्होंने भारत के बच्चे-बच्चे को बतलाया कि हमारा देश, हमारी संस्कृति कितनी विराट थी, हमारा चिकित्सा शास्त्र कितना उन्नत था, हमारी शिक्षा-व्यवस्था कितनी उन्नत थी। हम भारतवासी विश्व गुरु कैसे थे? उनको मात्र एक बार सुनने के बाद आम-जन से खास-जन के अन्दर से यह विचार स्वत: ही दूर हो जाता था कि भारत गडरियों, सपेरों का देश था। भारत की कोई संस्कृति नही थी। उन्होंने एक-एक भारतीय में स्वदेश का स्वाभिमान जगाया। एक-एक भारतीय को यह महसूस करवाया कि भारत विश्वगुरु था, भारत सोने की चिडियां था। भारत देवभूमि है भारत पूरे संसार में विशेष है। स्वदेशी विचार जिसकी पहली प्रेरणा महर्षि दयानन्द, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी ने दी, उसी प्रेरणा को उन्होंने आजादी के 50 साल बाद से ही दोबारा भारतीयों के ह्रदय में जगाया। उन्होंने एक-एक भारतीय को आजादी बचाओं आन्दोलन के माध्यम से झकझोर दिया कि 1947 में मिलने वाली आजादी सम्पूर्ण आजादी न होकर मात्र एक समझौता थी। 1997 को वे आजादी के 50 वर्ष न कहकर गुलामी के 50 वर्ष कहते थे वे कहते थे कि जब तक हमारी शिक्षा, चिकित्सा, कानून, अर्थ-व्यवस्था, कृषि-व्यवस्था का स्वदेशीकरण नहीं हो जाता तब तक सच्ची आजादी नहीं मिल सकती। अध्ययन काल में 1984 में जब भोपाल गैस त्रासदी हुई तब उन्होंने एक स्वयं-सेवक के रुप में जाकर सेवा प्रदान की। वहां पर जब वे लोगों से मिले। वहां जब उन्होंने हजारों बच्चों, बहनों, बुजुर्गों की दर्दनाक मौत देखी, जो बच गये थे उनकी दर्दभरी तकलीफ देखी और जब इसके मूल जिम्मेदार कम्पनी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई तो उनके भीतर का आक्रोश बाहर आया तथा उन्होंने ठान लिया कि अब वह भ्रष्ट व्यवस्थाओं को उखाड फेंकने के लिए सदैव कार्य करेंगे। 30 नवम्बर 2010 को उनके जन्म दिवस के अवसर पर ही राजीव भाई हमे छोडकर चले गये। पूरी रात पूज्य स्वामी जी भी सो नही पाये। उनको भी यूं लगा जैसे राजीव भाई के रुप में जो उनके दो हाथ जो करोडों हाथों के रुप में थे वह असमय छोडकर चले गये। रात को पूज्य आचार्य बालकृष्णजी महाराज ने विशेष विमान की व्यवस्था करके भिलाई से उनके पार्थिव देह को हरिद्वार मंगवाने की व्यवस्था की। राजीव भाई जी की शहादत का समाचार जैसे ही कार्यकर्त्ताओं को दिया गया वो फूट-फूटकर रोने लगे। राजीव भाई के छोटे भाई प्रदीप जी रात को ही भिलाई पहुंच चुके थे वह विशेष विमान के साथ देहरादून आ रहे थे। प्रात:काल के योग-सत्र में पूज्य स्वामी जी भाई राजीव जी के बलिदान से व्यथित रहे। उन्होंने भरसक प्रयत्न किया कि उनके अन्दर की भावनायें व संवेदनायें बाहर न आयें। लेकिन उनके स्वर का भारीपन, चेहरे की भावनाएं, आंखों की नमी यह बता रही तथा थी कि उनको इससे बहुत बडा अप्रत्याशित धक्का लगा है। योगपीठ के संवाद कक्ष मे लगातार फोन आने प्रारम्भ हो गये कि क्या हो गया? कोई भी कार्यकर्त्ता यह स्वीकार करने में सहज नही था की भाई राजीव जी यू बीच छोडकर जा सकते है। सभी कार्यकर्त्ताओं को ऐसा लगता था। कि कहीं न कहीं से तो यह उत्तर मिलेगा की ये खबर सत्य नही है। लेकिन विधाता के निर्णय अटल होते है। नियति से सामने इन्सान बेबस हो जाता है। किसी का मन, ह्रदय यह स्वीकार करने की हालत में नही था कि यह क्या हो गया? प्रात: 10 बजे से ही कार्यकर्त्ताओं का योगपीठ मे पहुंचावा शुरु हो गया। जो कार्यकर्ता दूर के क्षेत्र में थे वह भी जहां जैसे थे, जिस हालत में थे, बिना मौसम की परवाह किये, भूख-प्यास की परबाह किये बिना देश के अलग-अलग हिस्सों से भाई राजीव जी के अन्तिम दर्शन के लिये दौड पडे। संगठन प्रसार हेतु डॉ. जयदीप आर्य जी ओडिशा में थे। बहन सुमना: जी बिहार व झारखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्र में पूज्य महाराज जी के कार्यक्रम की तैयारी में व्यस्त थी। मैं स्वयं भी भिवानी जिले के चरखी दादरी तहसील में किसी कार्यक्रम में था। वही से हरिद्वार प्रस्थान किया। विशेष विमान से 10 बजे चलकर 1 बजे तक पार्थिव शरीर को देहरादून जोलीग्रान्ट हवाई अड्डे पर लाना था। पूज्य आचार्य जी स्वयं श्री रामभरत जी को लगातर निर्देश देकर इस कार्य को देख रहे थे। श्रद्घालयम में अन्तिम दर्शन की व्यवस्था की जा रही थी। सभी कार्यकर्त्ताओं का आग्रह था कि वह भाई राजीव जी के अन्तिम दर्शन करना चाहते है। इसलिये उनके पार्थिव शरीर को 30 नवम्बर को योगपीठ में रखने का निर्णय लिया गया। अन्तिम संस्कार व समय 1 दिसम्बर को प्रात: 10 बजे कनखल सती घाट पर रखा गया। 30 नवम्बर 2010 को भिलाई से विशेष विमान के माध्यम से पार्थिव देह को लगभग 1 बजे श्री संजय जी, आचार्य दयासागर जी, भाई प्रदीप जी लेकर देहरादून के लिए चले। इधर भाई राजीव जी के माता-पिता गाजियाबाद में अपने मामा जी के यहां पर थे इनको वहां से हरिद्वार लाया जा रहा था। माता ही ह्रदय की मरीज थी तो उनको भाई राजीव जी के देहान्त की जानकारी नही दी गई उनके सिर्फ मामा जी को पता था कि देहान्त हो चुका। पूज्य महाराज जी भी शिकोहाबाद के अपने दिन के सभी कार्यक्रम निरस्त करके हेलीकाँटर के द्वारा आचार्य स्वदेश जी, भाई सुधीर जी तथा कृष्णवीर शर्मा जी के साथ 1:30 बजे हरिद्वार पहुंच गये। ठीक 4 बजे विशेष विमान देहरादून के जाली ग्राण्ड हदाई अड्डे पर पहुंचा। वहां पर देहरादून, रुकडी, ॠषिकेश, हरिद्वार के सैकडों कार्यकर्त्ता प्रात: 11 बजे से ही रुके हुऐ थे। तीन बजे पूज्य आचार्य जी स्वयं भाई राजीव जी के पार्थिव शरीर को लेने हवाई अड्डे पर पहुंचे गये। ठीक 4 बजे श्री रामभरत जी, पूज्य आचार्य जी विशेष विमान से शव बाहर निकालकर एम्बुलेंस मे रखकर हवाई अड्डे के बाहर लाए। वहां पर कार्यकर्त्ताओं ने वाहन को रोक लिया तथा ताबूत के बाहर फूल चढाकर उनको श्रद्घाजंलि दी गयी। सभी कार्यकर्त्ता ने वैदिक मन्त्रोच्चारण किया। 4:30 बजे चलाकर 6 बजे के लगभग पार्थिव शरीर को पतंजलि योगपीठ में लाया गया। उनके माता-पिता को बताया गया था कि राजीव भाई की तबीयत थोडी खराब है इसलिये उनको पतंजलि मिलवाने के लिये लाया जा रहा है विडम्बना थी इन घण्टों में देश-विदेश में पता लग चुका था कि भाई राजीव जी नही रहे लेकिन उसको जन्म देने वाली मां को ही नही पता था कि उसकी आंखों का तारा चला गया। पतंजलि में ताबूत से पार्थिव शरीर को निकालकर मंच पर बर्फ से ऊपर लिटा दिया गया। पूज्य महाराज जी एवं पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी ने स्वयं भारत स्वाभिमान के ध्वज को उनके शरीर पर लिपटाया। दीप प्रज्जवलन किया गया तथा सभी कार्यकर्ताओं ने भरे मन से, सिसकते हुये उनके अन्तिम दर्शन किये। भाई राजीव जी के माता-पिता पहुंच गये, अब उनसे और छिपाना सम्भव नहीं था। जैसे ही उनको बताया गया तो वे अपने आपको सम्भाल नहीं पाये। मां लगातार विलख रही थी। पिताजी भी अपने होशोहवास में नही थे वो भी लगातार रो रहे थे। मां लगातार कह रही थी कि आंखे खोल राजू……., उठ जा राजू…….., और मां ने कहा कि उठ राजू………, अब तो उठ जा……, आज तेरा जन्मदिन है…….., तेरे जन्मदिन वाले दिन ये नही हो सकता है…..,। पूज्य महाराज जी ने स्वयं मां को गले लगाकर कहा कि हम सब तुम्हारे पुत्र है। तुम्हारे एक-दो नहीं करोडों बेटे है। पिताजी आचार्य जी ढाढस बंधा रहे थे। बहुत भावुकतापूर्ण दृश्य था जो ढाढस बंधाने की कोशिश कर रहे थे वह खुद अपना ढाढस खो रहे थे। अगले दिन प्रात: 7:30 बजे राजीव जी के पार्थिव शरीर को हल्दी, चन्दन, व गंगाजल में नहलाकर प्रात: 9 बजे अर्थी पर लिटाया शव को एम्बुलेंस से दिव्य योग मन्दिर आश्रम, कनखल में लाया गया। कनखल मे सभी कार्यकर्ताओं ने राजीव जी के अन्तिम दर्शन किए। स्वयं पूज्य आचार्य जी ने उनकी अर्थी को कन्धा दिया। पूज्य महाराज जी के साथ-साथ चल रहे थे वाहनों की कतारों ने श्रद्घानन्द चौक व पूरे कनखल को जाम की सी स्थिति में ला दिया। कनखल की सडकों पर भाई राजीव जी की अर्थी के पीछे हजारों की भीड थी दूर-दूर तक सिर्फ लोग ही लोग दिखाई पड रहे थे। भारत माता की जय………., बन्दे मातरम.............., भाई राजीव जी अमर रहे…..... तथा गायत्री मन्त्र के साथ अन्तिम यात्रा निकाली गई। हजारों की संख्या में अपनों दिलो में दर्द लिये कार्यकर्ता तथा जनता पीछे-पीछे चल रही थी। पार्थिव शरीर का क्रियाक्रम वैदिक विधि से करना था इसलिये सवा क्विटंल देशी घी, सवा सौ किलो हवन सामग्री, चन्दन की लकडी, कपूर, अगर-तगर, केशर के साथ चिता स्वयं पूज्य महाराज जी एवं श्रद्घेय आचार्य बालकृष्ण जी, स्वामी सम्पूर्णानन्द जी, डाँ0 प्रणव पाड्या जी, महन्त राजेन्द्र दास कोठारी जी, आचार्य प्रद्युम्न जी, आचार्य बलदेव जी ने अपने हाथों से सजाई। घी व साग्रमी के कारण लकडियों ने तुरन्त अग्नि पकड ली। पांच मिनट में ही लपटे 18 फीट ऊँची श्मशान घाट की बरसात रोकने वाली छत को छूने लगी। अग्नि लगातार प्रज्जवलित हो रही थी। जैसे-जैसे अग्नि की लपटे बढ रही थी वैसे-वैसे ही कार्यकर्त्ताओं की सिसकियां तथा आंखों की नमी भी बढ रही थी। श्मशान घाट में साऊण्ड सिस्टम से वैदिक मन्त्रोच्चारण पतंजलि योगपीठ के विद्वान कर रहे थे। महाराज जी एवं आचार्य जी स्वयं चिता में घी डाल रहे थे। सभी कार्यकर्त्ताओं ने भाई राजीव जी की चिता में अपने हाथों से मां भागीरथी के तट पर आहुतियां दी। श्मशान घाट में एक शोक सभा का आयोजन किया जिसमें सभी ने भाई राजीव जी के निधन को राष्ट्रीय क्षति बताया। सबने कहा कि भाई राजीव जी सदैव हम लोगो के विचारों में, भावनाओं में जीवित रहेंगे। उन्होंने जिस भारत का सपना देखा है हम उस भारत के सपने को साकार करेंगे। स्वामी जी ने नव-निर्मित भारत स्वाभिमान कार्यालय का नाम ‘राजीव भवन’ रखने की घोषणा की तथा 30 नवम्बर को स्वदेशी दिवस के रुप में मनाने का संकल्प लिया। धीरे-धीरे शान्त हो रही चिता की लपटें बेशक अपने साथ राजीव भाई के शरीर को जला रही थी। उनकी पार्थिव देह को पंच तत्त्वों में समाहित कर रही थी। लेकिन जैसे-जैसे चिता की लपटे शान्त हो रही थी, वैसे-वैसे ही कार्यकर्त्ताओं के ह्रदय की, संकल्प की, भावनाओं की अग्नि बढ रही थी। उनकी संकल्पना बढ रही थी कि हम भाई राजीव जी के सपने को साकार करेंगे। हम भाई राजीव के सपनों का भारत बनायेंगे। सामान्य व्यक्ति के मरने के बाद मात्र एक मुट्ठी राख बचती है लेकिन भाई राजीव जी जैसे देशभक्तों के जाने से सिर्फ राख नही बचती वरन एक वैचारिक क्रान्ति बचती है ऐसी क्रान्ति जो भारत को विश्वगुरु बनायेगी, जो भारत से भ्रष्ट व्यवस्थाओं का उखाडगी, जो भारत में सम्पूर्ण क्रान्ति करेगी। भाई राजीव के बलिदान दिवस पर संकल्प करें कि उनके सपने को साकार करेंगे। उनको सच्ची श्रद्घाजलि यह होगी कि हम स्वयं अपने जीवन से स्वदेशी का पालन करे तथा दूसरों को भी इसे अपनाने की प्रेरणा दें।


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पतंजलि योगपीठ और भारत स्वभिमान के लिए समर्पित थे ‘राजीव भाई’

* राजीव भाई जिनका निष्कलंक जीवन सादगी, स्वदेशी , पवित्रता, भक्ति, श्रद्घा, विश्वास से भरा हुआ था। चाहे लोगों ने उन्हें कितना भी कष्ट दिया हो उन्होंने उफ नहीं की।
* पूज्य स्वामी रामदेव जी का राजीव भाई से पहला संवाद कनखल के आश्रम मे हुआ था।
* राजीव भाई लगभग दो दशक से अपना संपूर्ण जीवन लोगों के लिये जी रहे थे।
* राजीव भाई भगवान के भेजे हुए एक श्रेष्ठतम रचना थे, धरती पर एक ऐसी सौगात जिसे हम चाह कर भी पुन: निर्मित नहीं कर सकते।
* राजीव भाई के ह्रदय में एक ऐसी आग थी, जिससे प्रतीत होता था कि वे अभी ही भ्रष्ट तंत्र को, भ्रष्टाचार को खत्म कर देंगे।
* ‘भारत स्वाभिमान’ आंदोलन के साथ आज पूरा देश उनके साथ खडा हुआ है।
* हम सबको मिल करके भारत स्वाभिमान का जो संकल्प राजीव भाई ने लिया था, उसे पूरा करना है और अब वो साकार रुप ले चुका है।
* जब भारत स्वाभिमान का आंदोलन बहुत बडे चरण पर है तो एक बहुत बडी क्षति हुई है जिसे शब्दों में बयान नही किया जा सकता। ये ह्रदय की नहीं बल्कि समस्त राष्ट्र की पीडा है।
* व्यक्ति जब समिष्ट के संकल्प के साथ जीने लगता है तो वो सबका प्रिय हो जाता है। वे अपने माता-पिता के लाल नही थे, बल्कि करोडों-करोडों लोगों के दुलारे और प्यारे थे। वे भारत माता के लाल थे।
* एक मां की कोख धन्य होती है जब ऐसे लाल पैदा होते है।
* राजीव भाई हमारे भाई ही नहीं बल्कि देश के करोडों-करोडों लोगों के भाई थे।
* प्रतिभावान, विनम्र, निष्कलंक जीवन था राजीव भाई का।
* राजीव भाई की याद में देश की जनता स्वदेशी अपनाने का संकल्प ले।
* ‘भारत स्वाभिमान’ के मुख्यालय का नाम ‘राजीव भवन’ होगा।
* पतंजलि योगपीठ और भारत स्वाभिमान के लिये समर्पित थे राजीव भाई।
* एक वाणी जो भ्रष्ट व्यवस्थाओं के खिलाफ ‘आग उगलती वह आज मौन हो गयी।’
* राजीव भाई को इन्साइक्लोपीडिया कहा जाता था। वे चलते-फिरते अथाह ज्ञान के सागर थे।– डाँक्टर प्रणव पंड्या जी
5000 वर्षों का ज्ञान, असीम स्मृति वाले, अपरिमित क्षमता वाले थे राजीव भाई।–डा0 पंड्या
एक महान आत्मा आज अपना प्रकाश फैलाकर अपना शरीर को अग्नि में विलीन कर गया है वो पुन: जन्म लेकर अपने कार्य को पूरा करेगा।– आचार्य अरुण जोशी जी


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